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भागवत कथा का वास्तविक उद्देश्य केवल श्रवण करना नहीं, बल्कि उसके संदेशों को व्यवहार में लाना है: पं. शशांक


भागवत कथा का वास्तविक उद्देश्य केवल श्रवण करना नहीं, बल्कि उसके संदेशों को व्यवहार में लाना है: पं. शशांक 


ईश्वर नगर में सात दिवसीय कथा का हुआ भव्य समापन


श्रद्धालुओं ने धर्म और संस्कारों के पालन का लिया संकल्प


भोपाल। ईश्वर नगर, दानापानी रोड में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापन भव्य धार्मिक आयोजन के साथ हुआ। कथा के अंतिम दिन श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति ने आयोजन को यादगार बना दिया।


आचार्य शशांक शेखर महाराज ने समापन अवसर पर कहा कि श्रीमद्भागवत मानव जीवन को दिशा देने वाला दिव्य ग्रंथ है। इसके संदेश व्यक्ति को आत्मिक उन्नति के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व का भी बोध कराते हैं। उन्होंने अंतिम श्लोक का वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को जीवन में नैतिकता, सेवा, प्रेम और सद्भावना को अपनाने का संदेश दिया।


कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने धर्ममय और संस्कारयुक्त जीवन जीने का संकल्प लिया। पूरे आयोजन के दौरान भक्तिमय वातावरण बना रहा और अंत में महाप्रसादी वितरण के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।

कथा के समापन अवसर पर कथावाचक आचार्य शशांक शेखर महाराज ने श्रीमद्भागवत के अंतिम श्लोक का भावपूर्ण वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को धर्म, सत्य, करुणा और सदाचार के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन को श्रेष्ठ बनाने वाला मार्गदर्शक ग्रंथ है। इसके आदर्शों को अपनाकर व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।


महाराज ने उपस्थित श्रद्धालुओं से समाज और राष्ट्र के हित में सकारात्मक कार्य करने तथा नैतिक मूल्यों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प भी कराया। उन्होंने कहा कि भागवत कथा का वास्तविक उद्देश्य केवल श्रवण करना नहीं, बल्कि उसके संदेशों को व्यवहार में लाना है।


जहां एक ओर कथा पंडाल में भक्तिमय वातावरण बना रहा। वहीं भक्तिरस में डूबे श्रद्धालुओं ने भजनों पर जमकर नृत्य किया।भजन-कीर्तन और जयघोष के साथ कथा का समापन किया। 


कथा के पश्चात महाप्रसादी का वितरण किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। पूरे आयोजन के दौरान क्षेत्र में आध्यात्मिक और भक्तिमय माहौल बना रहा।वहीं आयोजन समिति मां वैष्णों देवी दुर्गा समिति की सभी नरीशक्तियों ने अपने जीवन में राधा रूक्मणी और सीता जैसे आचरणों को अपनाने का वादा कर नम आंखों से भागवत जी की विदाई करी।





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