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सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में ‘स्मिता’ की मौत से उठे गंभीर सवाल

 

सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में ‘स्मिता’ की मौत से उठे गंभीर सवाल



हमले के बाद समय पर उपचार नहीं मिलने का आरोप, वन विभाग की कार्यप्रणाली और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था पर सवाल

 नर्मदापुरम जिले से
नर्मदापुरम/सतपुड़ा।

सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में मादा हाथी ‘स्मिता’ की मौत ने वन्यजीव प्रबंधन और विभागीय व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारी के अनुसार 9 अगस्त की रात नर हाथी ‘कृष्णा’ ने स्मिता पर हमला किया था। अगले दिन महावतों द्वारा हाथियों को वापस लाए जाने पर स्मिता के शरीर पर गंभीर चोटें पाए जाने की बात सामने आई।

घटना के बाद स्मिता की हालत बिगड़ती रही। आरोप है कि समय पर पर्याप्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं हो सकी और उपचार में देरी के कारण उसकी मौत हो गई। इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि गंभीर रूप से घायल वन्यजीव के लिए रिजर्व में तत्काल चिकित्सा सहायता की वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं थी।

नर हाथी की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल

विशेषज्ञों के अनुसार नर हाथियों में आक्रामक व्यवहार की स्थिति में उन्हें अन्य हाथियों से सुरक्षित दूरी पर रखना और उनकी निगरानी बढ़ाना महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में जांच का विषय यह है कि घटना से पहले दोनों हाथियों की निगरानी किस प्रकार की जा रही थी और रात्रिकालीन गश्त की व्यवस्था कितनी प्रभावी थी।

यदि घटना के समय निर्धारित निगरानी व्यवस्था में कोई चूक हुई है तो इसकी जिम्मेदारी तय किया जाना जरूरी है। रात्रिकालीन गश्त के रिकॉर्ड, ड्यूटी चार्ट और संबंधित निगरानी दस्तावेजों की जांच से ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

आपातकालीन पशु चिकित्सा व्यवस्था पर उठे सवाल

घटना के बाद घायल हाथी को तत्काल विशेषज्ञ चिकित्सा उपलब्ध कराने की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि रिजर्व का पशु चिकित्सक उस समय शासकीय कार्य से बाहर था। ऐसे में सवाल है कि वन्यजीवों के लिए आपातकालीन परिस्थितियों में वैकल्पिक पशु चिकित्सक अथवा त्वरित चिकित्सा दल की व्यवस्था क्यों नहीं थी।

सतपुड़ा जैसे महत्वपूर्ण टाइगर रिजर्व में बड़ी संख्या में वन्यजीवों की मौजूदगी को देखते हुए किसी भी गंभीर घायल वन्यजीव के लिए 24 घंटे की आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था होना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

जांच से सामने आ सकती है वास्तविक जिम्मेदारी

स्मिता की मौत के वास्तविक कारण और उपचार में हुई देरी की स्थिति स्पष्ट करने के लिए निष्पक्ष जांच आवश्यक है। जांच में यह देखा जाना चाहिए कि घटना के बाद अधिकारियों और कर्मचारियों को सूचना कब मिली, चिकित्सा दल कितने समय में मौके पर पहुंचा, प्राथमिक उपचार कब शुरू हुआ और उपचार में किसी प्रकार की लापरवाही अथवा देरी हुई या नहीं।

इसके साथ ही रात्रिकालीन गश्त के रिकॉर्ड, ड्यूटी रजिस्टर, संबंधित कर्मचारियों की तैनाती तथा उपलब्ध निगरानी रिकॉर्ड की भी जांच की जानी चाहिए।

वन्यजीव संरक्षण नियमों के तहत कार्रवाई की मांग

हाथी संरक्षित वन्यजीव है। ऐसे में उसकी मृत्यु के मामले में निर्धारित कानूनी एवं विभागीय प्रक्रिया के अनुसार जांच और पोस्टमार्टम की कार्रवाई महत्वपूर्ण है। यदि जांच में किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही अथवा कर्तव्य में गंभीर चूक सामने आती है, तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय कर विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

पर्यावरण प्रेमियों और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों की मांग है कि स्मिता की मौत की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा जांच रिपोर्ट के आधार पर दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों पर कार्रवाई की जाए।

सवाल जो जवाब मांगते हैं

  • घटना से पहले नर हाथी की निगरानी व्यवस्था कैसी थी?
  • रात्रिकालीन गश्त वास्तव में हुई या केवल रिकॉर्ड तक सीमित रही?
  • घायल स्मिता को चिकित्सा सहायता कितने समय बाद मिली?
  • आपात स्थिति के लिए वैकल्पिक पशु चिकित्सक की व्यवस्था क्यों नहीं थी?
  • घटना से संबंधित ड्यूटी और गश्त रिकॉर्ड की जांच कब होगी?
  • यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

स्मिता की मौत केवल एक वन्यजीव की मृत्यु का मामला नहीं है, बल्कि यह वन्यजीवों की सुरक्षा, निगरानी और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है। अब निगाहें वन विभाग और शासन की जांच पर हैं कि इस मामले में वास्तविकता क्या सामने आती है और जिम्मेदारी किसकी तय होती है।

— दयाराम कुशवाहा, पत्रकार
नर्मदापुरम

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